हार जीत
क्या हार में क्या जीत में, किन्चित नहीं भयभीत मैं, कवि शिव मंगल सिंह सुमन की यह पंक्तियाँ हमें हार और जीत दोनों को समान रुप से स्वीकार करने की प्रेरणा देती हैं. श्रीमद्भगवद्गीता भी तो अपने निष्काम कर्म से हमे यही प्रेरणा देती हैं कि फल की आकांक्षा रखे बिना ही सदैव कर्मरत रहो. कर्मफल तो कभी विपरित तो कभी अनुकूल रहेगा, क्या इससे डरकर कर्म करना छोड़ दोगे, नहीं बिल्कुल नहीं कम से कम मैं तो कभी भी ऐसा नहीं करूंगा.
श्रीमद्भगवद्गीता अपने स्थितप्रज्ञ की अवधारणा से भी यही ज्ञान देती है कि सुख और दुख, सम-विषम किसी भी परिस्थिति में हमे एक भाव रखना चाहिए. मेरे सामने दो उदाहरण है अभी हाल ही के, एक फ्रांस की टीम फुटबाल विश्व कप हार गई और उसके महान खिलाड़ी kiliyan Mbape बेहद दुखी नज़र आए, दूसरा आज ही मेरा पुत्र अभ्युदय skating में सिल्वर मेडल जीत कर आया, लेकिन वह अपनी जीत के प्रति समभाव में है.
मैं समझता हूँ कि खेल हो या जिंदगी, सदैव हमारे अनुकूल नहीं चलती, अगर आपको जितना अच्छा लगता है तो आपका प्रतिद्वंदी भी हार कर प्रसन्न नहीं होता है. तब जरूरत इस बात की है कि अपनी अपनी स्थिति को अत्यंत सहजता और सरलता से स्वीकारते हुए दूसरे पक्ष के सुख या दुःख में शामिल हुआ जाए......आज मैं यह ब्लॉग लिखने की शुरुआत कर रहा हूँ, इसके लिए मैं अपनी पत्नी अमृता का आभारी हूं कि उन्होंने मुझे प्रेरित किया, आज के मेरे ब्लॉग का टॉपिक भी उसी ने दिया है....जय हिन्द जय भारत
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